Sunday, 20 November 2016

माँ (ग़ज़ल)

अपनी गोद में मुझ को सुला दे आज माँ,
हाथों के दोलन में झुला दे आज माँ,

कदमो की आहट मेरे ढूंढे है तुझे,
है तू कहाँ कोई जुला दे आज माँ,

है हर तरफ घर में उदासी सी अब,
तू बात कोई सी चला दे आज माँ,,
नज़रे सभी की आज है मुझ को घूरती
हर एक नज़र को तू जला दे आज माँ,,

कोई नहीं मुझ को उठाता है सुबह,
आ के मुझे फिर से हिला दे आज माँ,,

है भूख मुझ को तेरे हाथो से खाने की,
रोटी मुझे आ के खिला दे आज माँ,,

मनिंदर सिंह "मनी" 

जुला---जवाब,
दोलन---झुला,


Thursday, 3 November 2016

अरमान मेरे सब मचलने है लगे...........ग़ज़ल

वो साथ मेरे आज चलने है लगे,
अरमान मेरे सब मचलने है लगे,,
तन्हाइयो से थी कभी दोस्ती मेरी,
उनसे गुफ्तगू रोज करने है लगे,,
कोई न सरनामा मेरा था यूँ कहीं,
हम उनके ही दिल में रहने है लगे,,
बेवक्त, बेपरवाह थे हम कभी,
खोने से उनको आज डरने है लगे,,
हो सके खुदा मुझे माफ़ करना अभी,
हम आयतें उस की पढ़ने है लगे,,

Thursday, 27 October 2016

तुम आज मुझ को अपने से लगने लगे.........ग़ज़ल

तुम आज मुझ को अपने से लगने लगे,
दिल में मेरे तुम बन शमां जलने लगे,,
थे अजनबी मुझ से कभी तुम ऐ सनम,
बन आज साया साथ तुम चलने लगे,,
होने लगी बातें तेरे मेरे दरमियां,
लब चुप गुफ्तगू नैन खुद करने लगे,,
मैं था कभी गुमनाम राहों पर कहीं,
तेरे साथ लम्हे खुशनुमा लगने लगे,,
जाने न कोई कैसे हो जाये इश्क,
तेरे लिये हम ऐ “मनी” सजने लगे,,
मनिंदर सिंह “मनी”

Tuesday, 25 October 2016

तलाश रहे है लोग वजह मुस्कुराने की..........आजाद ग़ज़ल

तलाश रहे है लोग वजह मुस्कुराने की,
टूटे हुए रिश्तो को फिर से निभाने की,,

अंजाने में हुई अपनों से भूलो को भूल,  
चेष्टा मे हर कोई अपनों को मनाने की,,

दिलो में प्रेम ही प्रेम इक दूजे के लिए,
चाहत में हर कोई अपनों को पाने की,

छोटे छोटे से परिवारों में बंधा हर कोई,
हठ सभी की बैठ आँगन में बतियाने की,,

गुजारिश है "मनी" की भुला कर ईष्या को,
कोशिश करो सभी प्रेम का बाग़ सजाने की,

जब कोई हाल ऐ जिंदगी पूछता शख्स मिलता है.......आजाद ग़ज़ल

मेरी आँखों में अश्को का तूफान सा उमड़ता है,
जब कोई हाल ऐ जिंदगी पूछता शख्स मिलता है,,

हर दर्द को ढक लिया मैंने मुस्कुराहट के पर्दे में,
आह उठती है तेरा जिक्र दिल जब मुझसे करता है,,

तुझे तेरी ख्वाहिशो ने भुला दी अपनी ही हर कसम,
मेरा उन्ही वादों की यादों के सहारे दिन गुजरता है,,

कभी ना कभी तो मेरी यादों के फेरे तुझे सताते होंगे,
ये सोच मेरे जेहन में प्रश्नों का कारवाँ सा निकालता है

लगता है मिल गए तुझे मुझसे ज्यादा चाहने वाले "मनी"
इसीलिए तो ख़्वाबो में भी तू मुझे अब नहीं मिलता है,,

प्रेम की कली अभी अभी खिली........आजाद ग़ज़ल

प्रेम की कली अभी अभी खिली,
उदास दिल को ख़ुशी अब मिली,,

हर राह पर था, तन्हा, अकेला,
आँखों में बन काजल सी खिली,,


मदहोश कर गयी सूरत उसकी,
मद बन दिल में उतरती मिली,,

लहराती जुल्फे, कटार से नैन,
आज मेरा कत्ल करती मिली,,

हार कर भी सब कुछ जीत गया,
जब साथ चलने की रजा मिली,

जाने कब मैं प्रेम की गलियो में आ गया.......आजाद ग़ज़ल

जाने कब मैं प्रेम की गलियो में आ गया,
दिल पर इक अजब सा खुमार छा गया,,

अभी रखा ही था पाँव जवानी के दर पर,
साथ चलने का वादा लिए कोई आ गया,,

खोया था कल तक बचपन की कहानी में,
चुपके से दिल में कोई जगह बना सा गया,

बचपन का याराना ना चाहते छूटने लगा,
देख मुझे कहता हर कोई भंवरा आ गया,,

ना देखी जात मैंने ना पूछी कोई बात "मनी"
एक पल में उस पर सब कुछ हार सा गया,,

आ गया मैं बर्बाद होने की कगार पर........आजाद ग़ज़ल

आ गया मैं बर्बाद होने की कगार पर,
हुआ ना शक मुझे अपनों की मार पर,,

मीठी मीठी बातों में लुटता चला गया,
हँसता है जग सारा देख मेरी सार पर,,

हम साया बनकर साथ चले थे वो मेरे,
यकीन नहीं आता अपनी इस हार पर,,

कहते थे खुशियो का बगीचा सजा देंगे,
तन्हा हुआ बैठा हूँ उनके बनाये थार पर,,

टूटे घड़े कभी किसी को पार नहीं लगाते,
गैरो से ज्यादा अपने ही जी रहे है खार पर,,

   

वक्त............आजाद ग़ज़ल

किसी के रोके से रुकता नहीं वक्त,
किसी के झुकाये झुकता नहीं वक्त,

अपनी ही मदमस्त चाल चले जा रहा,
कभी भी कुछ भी पूछता नहीं वक्त,,

ना किसी राजे का, ना गरीब का हुआ,
सदैव आगे चले पीछे मुड़ता नहीं वक्त,

अचेत विश्व में हर कोई उसकी चाल से,
तबदीली की विधि को भुलता नहीं वक्त,

ना रंग, ना कोई आकार, ना कोई भेद,
कितना भी चाहो पर बंधता नहीं वक्त,,


"जी"........

जीवन के हर राह पर काम आता "जी",

नाम के साथ लग मान दिलाता "जी",

एक लफ्ज़ में सहमति जताता  "जी ",

कभी ख़ुशी की हाँ बन आता "जी ",

कभी ग़मी में हामी दर्शाता "जी",

कभी दफ्तरों में माखन लगता "जी",

कभी हर सवाल का जवाब होता "जी",

कभी दिल के ज्जबात दिखाता "जी",

कभी प्यार की परिभाषा समझता "जी",

खुद को छोटा रख कर बड़ा बनाता "जी",

क्या रखा है "मनी" तू ता करके जीने में,

जी कहो जी सुनो जीने का सलीका सिखाता "जी",


घमंड............

सब लगे है अपने अपने धर्म को बचाने में,
इंसानियत कहाँ गुम किसी को खबर नहीं,
पूछ लो किसी से किसी की हाल ऐ जिंदगी,
झट से बता देंगे, पर खुद की खबर नहीं,

जाने कैसी हवा चली है ज़माने में हर तरफ,
महकशी छोड़ कर लोग खून पीने लगे है,
अपनों में और गैरो में कुछ ज्यादा फर्क नहीं,
धीरे धीरे रिश्ते हर किसी के खत्म होने लगे है,

इंसान का कुछ ना था कुछ ना होगा इस जग में,
जन्म दूसरे ने, नाम दूसरो ने, औरो ने जला दिया,
खाली हाथ आया था और खाली हाथ चले जाना,
फिर जाने क्यों "मनी" हर किसी ने घमंड कमा लिया

ना मुझे सपनो में दिखते हो.......ग़ज़ल

ना मुझे सपनो में दिखते हो,
ना ही तुम मुझे खत लिखते हो,

दर पर बैठी तेरी बाट में,
पर तुम आते नहीं दिखते हो,

कहते थे रोज लिखूंगा खत,
मुझे तो अब झूठे से लगते हो,,

कभी हमसाया थे तुम मेरे,
अंधेरो में गुम हुए लगते हो,,

ढूंढू कहाँ तुम्हे मैं सनम,
शायद तुम मुझ से छिपते हो,